गंगा दशहरा पर गंगा की सौगंध

-नेशनल वार्ता ब्यूरो- साभार-नेशनल वार्ता ब्यूरो- गंगा को माँ के रूप में स्वीकार करने वाले भारतीयों के लिए आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है।..

-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

साभार-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

गंगा को माँ के रूप में स्वीकार करने वाले भारतीयों के लिए आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। अमूमन भारतीय यह मानते हैं कि आज के दिन माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। माँ का आज के दिन आशीर्वाद लेना धन्य हो जाने के बराबर है। इसीलिए, हिन्दू की कोशिश रहती है कि वह गंगा में जाकर डुबकी लगाएं। डुबकी लगाने से पहले माँ गंगा की आराधना करें। वैसे भी माँ गंगा उत्तर भारत को जीवन देती है। माँ गंगा के अस्तित्व पर ही हमारा अस्तित्व टिका हुआ है। माँ गंगा की पूजा हिन्दू मानसिकता के पर्यावरण प्रेम का भी प्रतीक है। माँ गंगा की खुशहाली पर हम भारतीयों की खुशहाली निर्भर करती है। हरिद्वार से लेकर काशी तक भक्तों को माँ गंगा के घाटों पर उमड़ते हुए देखा जा सकता है। कोरोना के खौफ के कम होते ही हिन्दू जगह-जगह माँ गंगा के पवित्र घाटों की ओर श्रद्धा भाव से लपकते हुए देखे जा रहे हैं। यह सिलसिला इस समय शाम के चार बजे के बाद भी जारी है। हिन्दू माँ गंगा को लेकर बहुत संवेदनशील है। ऐसी स्थिति में माँ गंगा की स्वच्छता का अभियान हमारी कमियों की ओर इशारा करता है। हमें तो स्वयं ही सजग रह कर माँ गंगा को गौ मुख से गंगा सागर तक पवित्र रखना चाहिए। इस काम के लिए किसी सरकारी अभियान की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी। सरकारी अभियान इस बात का प्रमाण है कि हम कहने को तो गंगा नदी को माँ गंगा मानते हैं लेकिन हमारा आचरण बिल्कुल अलग है। आचरण को लेकर हम उदासीन हैं। उत्तराखण्ड का ही उदाहरण ले लीजिए। उत्तराखण्ड में जगह-जगह अलकनन्दा और भागीरथी के किनारे कचरे के ढेर देखे जा सकते हैं। ये ढेर स्थानीय नगर एवं उपनगर निकायों की अकर्मण्यता का प्रमाण हैं। भागीरथी और अलकनन्दा के पहाड़ी तटों पर कचरे के ढ़ेर हमारी कथनी करनी के भेद को उजागर कर रहे हैं। उत्तराखण्ड में ही जगह-जगह अभी भी सीवर की गंदगी सीधे इस पवित्र नदी में ही जाकर गिरती है। यदि हम गंगा को माँ मानते हैं तो यह कैसी मान्यता है जिसमें हमारी सभी मान्यताएं ध्वस्त होकर रह जाती हैं। हमें तो मोक्ष की कामना में मृत्य शरीरों की राख तक से माँ गंगा की रक्षा करनी चाहिए। मृत व्यक्ति की राख हो या कोरी लकड़ी की राख, इसे माँ गंगा में नहीं बहाना चाहिए। हमें बदलना होगा। हमें महान सनातन संस्कृति को ईमानदारी से समझना होगा ताकि संसार में हमारा सम्मान बढ़े और नदियों की रक्षा हो। नदियों के स्वास्थ्य पर ही देश का भविष्य निर्भर है। आप कितना ही विकास कर लो बिना पानी के सब सूना है। हिन्दू धर्म नेताओं, पण्डे पुजारियों और मठ मन्दिरों के मठाधीशों को इस मामले में पहल करनी पड़ेगी। इस मामले में किसी तरह की कोताही खतरनाक है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि माँ गंगा में ही नहीं, माँ यमुना, माँ कावेरी, माँ गोदावरी, माँ कृष्णा, माँ शतलज, माँ ब्यास, माँ झेलम, माँ नर्मदा, माँ सरयू, माँ शारदा, माँ गोमती, माँ घाघरा, माँ पयस्विनी, माँ गन्डक, माँ कोसी और अन्य सभी माताओं के जल में सड़ा पत्ता तक ना डाला जाए। मृत शरीर की राख और स्नानागारों की गंदगी तो बहुत दूर की बात है। हमें अपनी चेतना की ओर लौटना होगा। अर्थात हमें वेदों में विराजमान ज्ञान की ओर लौटना होगा। हम महान थे हमें फिर महान बनना ही होगा। -वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून

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