कुख्यात कानपुर जिहाद

साभार-नेशनल वार्ता ब्यूरो- -वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून अब तो आम भारतीय मानने लगेगा कि जिहाद और जिहादी आतंक क्या होता है। जो अभी तक मान नहीं पाए हैं वे भारतीय बीते दिवस कानपुर में बरपाए गए जिहाद पर गौर कर लें। उन्हें समझ में आ जाएगा कि जिहाद का क्या मतलब होता है और…

साभार-नेशनल वार्ता ब्यूरो-

-वीरेन्द्र देव गौड़, पत्रकार, देहरादून

अब तो आम भारतीय मानने लगेगा कि जिहाद और जिहादी आतंक क्या होता है। जो अभी तक मान नहीं पाए हैं वे भारतीय बीते दिवस कानपुर में बरपाए गए जिहाद पर गौर कर लें। उन्हें समझ में आ जाएगा कि जिहाद का क्या मतलब होता है और कौन है जिहादी मजहब। दो चार मुसलमानों के जिहाद से दूर रहने से हम जिहाद को जिहाद कहना कैसे छोड़ दें। जिस जिहादी आतंक ने जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का जीना हराम कर दिया है। उस जिहाद और जिहादी आतंक की ढाल बनने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ चुनाव आयोग को एक्सन लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। भारत की जज विरादरी को कानून की पढ़ाई के दौरान अगर जिहाद और जिहादी आतंक का पाठ पढ़ाया जाता तो इन्हें समझ में आता कि जिहाद और जिहादी आतंक मानवाधिकारों की पल-पल धज्जियाँ उड़ाता आ रहा है। भारत के लोगों के मूल अधिकारों पर करारा प्रहार करता आ रहा है। कानून की पढ़ाई में सुधार की आवश्यकता है। कानून की पढ़ाई करने वालों और इतिहास के विद्यार्थियों को अलग से जिहाद और जिहादी आतंक पर कोर्स कराना चाहिए। यही नहीं बल्कि छठी कक्षा से इसे पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। ताकि हिन्दू गँवार न रहने पाए। उसे समझ आ जाए कि उसका असली शत्रु कौन है। उसे समझ में आ जाए कि तमाम राजनीतिक पार्टियाँ वोट के लालच में किस तरह से जिहाद और जिहादी आतंक के खलिहान बन चुकी हैं। अब समय आ गया है कि जिहाद और जिहादी आतंक पर कठोर प्रहार किया जाए। इनके लिए अलग से कारावासों का निर्माण हो। जहाँ इन्हेें यह समझाया जा सके कि इनका जिहाद धर्मयुद्ध नहीं कुकर्म युद्ध है। इसमें दो राय नहीं कि इसी जिहाद और जिहादी आतंक के बल पर आज संसार में लगभग 60 इस्लामी मुल्क हैं। हमें इस्लाम से कोई परेशानी नहीं। हमें जिहाद और जिहादी आतंक से अब मुकाबला करना है। देश के अन्दर सेना की तर्ज पर एन्टी जिहादी सेना तैयार की जानी चाहिए। जिसमें घातक कमाण्डो भर्ती किए जाएं। ये सरकारी कमाण्डो जिहाद और जिहादी आतंक के विरूद्ध लड़ाई लड़ें। पुलिस रोजमर्रा के अन्य मामलों पर ध्यान दे। अगर यह संभव नहीं है तो पुलिस की भर्ती में ही पुलिस के रूप में ये कमाण्डों सैनिक भर्ती किए जा सकते हैं। कानपुर में बरपाए गए जिहाद में जो तस्वीरें सामने आ रही हैं। वे चीख-चीख कर कह रही हैं कि हमारी पुलिस जिहाद और जिहादी आतंक से निपटने में सक्षम नहीं हैं। जिहाद और जिहादी आतंक के मतवाले भारत के अन्दर जगह-जगह मिनी पाकिस्तान तैयार करने के लिए जिहादी कसरत कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर में पिछले 32 सालों से नहीं बल्कि पिछले 72 सालों से जोरों से यही चल रहा है। भारतीय, अमूमन इतिहास में बहुत कमजोर होते हैं। भारतीय अपने पर हुए बर्बर अत्याचारों को बहुत जल्दी भुला देते हैं। उत्तर प्रदेश के कैराना में बरपाए गए जिहाद को हम भारतीयों ने आसानी से भुला दिया। वहाँ से जिहादी आतंकी नाहिद हसन को हमने जिता दिया। हमने मृगांका को हरा दिया। हम अपने अस्तित्व को लेकर बहुत लापरवाह हैं। जिहादी और जिहादी आतंकी हमारी इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। फिलहाल तो बुल्डोजर बाबा कानपुरिया जिहादियों को ठिकाने लगा देंगे लेकिन बुल्डोजर बाबा हमेशा तो मुख्यमंत्री रहने वाले नहीं। सपा, बसपा और कांग्रेस का राज लौटते ही ये जिहादी फिर छाती चौड़ी करके अपने मजहबी फर्ज को अंजाम देने के लिए निकल पड़ेंगे।  ये राजनीतिक दल इन जिहादियों को सलाखों के पीछे पहुँचाना तो दूर उनके खिलाफ उफ तक करने को तैयार नहीं। इन राजनीतिक दलों के साथ-साथ भारत के वामपंथियों कोें हिन्दुओं में आतंकवादी दिखाई देते हैं। इन्हें हिन्दुओं में कमियाँ दिखाई देती हैं। जिहाद और जिहादी आतंक बरपाने वालों का ये सदैव बचाव करते ही दिखाई देते हैं। आज के ये जयचन्द बहुत खतरनाक हैं। ये हर पृथ्वीराज चौहान की गरदन उड़ा देना चाहते हैं। ऐन वक्त पर जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कानपुर देहात के अंतरगत परौंख गाँव में एक मंच पर उपस्थित थे उसी समय जिहादियों ने जिहाद बरपा दिया। जिहादियों को पता था कि कई थानों की पुलिस राष्ट्रपति के गाँव परौंख में मौजूद थी। वे जानते थे कि वहाँ से पुलिस को वापस बुलाना मुमकिन नहीं था। इसका लाभ उठाकर जिहादियों ने हिन्दुओं पर हमला बोला और लगभग पाँच घंटे पुलिस को छकाते रहे। यकीनन, कल बरपाए गए जिहाद में पीएफआई का मुख्य किरदार है।

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